पाठ्यक्रम: GS2/ राजव्यवस्था
संदर्भ
- केंद्रीय मंत्रिमंडल ने सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या 34 (जिसमें भारत के मुख्य न्यायाधीश भी शामिल हैं) से बढ़ाकर कुल 38 करने की स्वीकृति प्रदान की है।
- यह प्रस्ताव संसद के आगामी सत्र में सर्वोच्च न्यायालय (न्यायाधीशों की संख्या) अधिनियम, 1956 में संशोधन के माध्यम से लागू किया जाएगा।
संवैधानिक प्रावधान
- संविधान का अनुच्छेद 124(1) संसद को सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या निर्धारित करने और बढ़ाने का अधिकार देता है।
- संविधान में प्रारंभिक रूप से भारत के मुख्य न्यायाधीश और अधिकतम सात न्यायाधीशों का प्रावधान था, जिससे भविष्य में विस्तार की लचीलापन सुनिश्चित हो सके।
- यह संवैधानिक व्यवस्था न्यायिक क्षमता को बदलती सामाजिक-आर्थिक और विधिक आवश्यकताओं के अनुरूप ढालने की आवश्यकता को दर्शाती है।
सर्वोच्च न्यायालय की शक्ति का विकास
- सर्वोच्च न्यायालय (न्यायाधीशों की संख्या) अधिनियम, 1956 ने प्रारंभ में न्यायाधीशों की संख्या (मुख्य न्यायाधीश को छोड़कर) 10 तय की थी।
- 1960 संशोधन द्वारा संख्या 13 और 1977 संशोधन द्वारा 17 की गई।
- बाद के संशोधनों द्वारा संख्या क्रमशः बढ़ाई गई और 2019 संशोधन द्वारा इसे 33 (मुख्य न्यायाधीश को छोड़कर) तक बढ़ाया गया।
संख्या वृद्धि का औचित्य
- मामलों की लंबित संख्या में वृद्धि: सर्वोच्च न्यायालय वर्तमान में 92,000 से अधिक लंबित मामलों का सामना कर रहा है।
- महामारी के बाद ई-फाइलिंग और डिजिटल तंत्रों के कारण मामलों का प्रवाह और बढ़ा है।
- न्यायिक रिक्तियाँ और सेवानिवृत्तियाँ: वर्तमान रिक्तियों ने न्यायाधीशों की प्रभावी कार्यशील क्षमता को कम कर दिया है।
- 2026 में कई न्यायाधीशों की सेवानिवृत्ति होने वाली है, जिससे क्षमता पर और दबाव पड़ेगा।
- विस्तारित अधिकार क्षेत्र और कार्यभार: सर्वोच्च न्यायालय संवैधानिक मामलों, अपीलीय अधिकार क्षेत्र और जनहित याचिकाओं से संबंधित मामलों की सुनवाई करता है।
- शासन एवं विधिक विवादों की बढ़ती जटिलता ने कार्यभार को अत्यधिक बढ़ा दिया है।
- सुधार अभियान: विधि आयोग (120वीं और 245वीं रिपोर्ट) ने न्यायिक शक्ति बढ़ाने की आवश्यकता पर बल दिया है।
- ऑल इंडिया जजेस एसोसिएशन बनाम भारत संघ मामले में भी न्यायाधीश-जनसंख्या अनुपात बढ़ाने की सिफारिश की गई थी।
चिंताएँ
- संख्या बनाम गुणवत्ता: केवल न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाना लंबित मामलों की समस्या का समाधान नहीं कर सकता।
- संरचनात्मक बाधाएँ: सीमित न्यायालयीन अवसंरचना और प्रशासनिक क्षमता दक्षता को प्रभावित करती हैं।
- मामला प्रबंधन समस्याएँ: बार-बार स्थगन जैसी प्रक्रियात्मक देरी लंबित मामलों में बड़ा योगदान देती है।
- मामलों का केंद्रीकरण: बड़ी संख्या में अपीलें सर्वोच्च न्यायालय तक पहुँचती हैं, जिससे इसका ध्यान मूल संवैधानिक कार्यों से भटकता है।
आगे की राह
- प्रौद्योगिकी के उपयोग से मामला प्रबंधन प्रणाली को सुदृढ़ करना, मामलों के निपटान की दक्षता बढ़ा सकता है।
- मध्यस्थता और पंचाट जैसे वैकल्पिक विवाद समाधान तंत्र को बढ़ावा देना न्यायालयों पर भार कम कर सकता है।
- विशेष अनुमति याचिकाओं (SLPs) के प्रवाह को तर्कसंगत बनाना सर्वोच्च न्यायालय को संवैधानिक मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करने में मदद करेगा।
- निचली न्यायपालिका और उच्च न्यायालयों की क्षमता बढ़ाना सभी स्तरों पर लंबित मामलों को संबोधित करने के लिए आवश्यक है।
स्रोत: TH
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